لماذا الذكاء الخيار مغلق في روسيا – معلومات من الداخل

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Почему IQ Option закрыт в России информация от инсайдера

С вами Анна Александровна, сегодня хочу поделиться с вами инсайдерской информацией, которую я узнала от одного из трейдеров. Насколько эта информация точная, я не знаю, но повод для размышления конечно даёт. Если вы хоть несколько месяцев в теме бинарных опционов, то наверняка знаете, что один из крупных брокеров iq option закрыт для трейдеров из России.

Для начала расставлю точки над и. Я не имею никакого отношения к этому брокеру. Я пробовала вести торговлю на платформе этого брокера, однако через неделю работы вывела все деньги и больше не торговала. Просто платформа оказалась не совсем удобной для меня. Однако для начала знакомства с опционами, эта платформа имеет место быть.

Почему iq option?

Официальная информация от этого брокера говорила, что брокер iq option покидает ру рынок из за изменений в правовом законодательстве Российской Федерации и бла-бла-бла. Однако человек близкий к этому брокеру уверяет, что это не совсем так. Утверждают, что IQ option закрыли по причине читерства вип клиентов. Ни для кого не секрет, что трейдеры, инвестирующие большие деньги в торговлю бинарными опционами, становятся вип клиентами брокера. Брокер в свою очередь предлагает особые условия для таких клиентов. Иногда это космические бонусы и предложения. Одна из таких фишек, прибыльность по сделкам может быть очень близкой к 100%. На чем и сыграли вип трейдеры.

Как все происходит:

На счет клиента iq option в России поступает 5-значная сумма американских долларов. Брокер воодушевлен, еще один вип клиент. Но не тут – то было, трейдер не прекращает торговлю, пока не наторгует крупную сумму. А затем ставит на вывод всю сумму. Брокер в шоке, счет в банке начинает трещать по швам.

Стратегия Парлая

В торговле используется стратегия Парлая . Сейчас я вам расскажу по секрету о системе Парлая, но занести её в список своих стратегий и рекомендовать новичкам или трейдерам со средним уровнем я не могу. Всё по причине супер высокого риска.

Как и мартингейл, Парлай перекочевал в бинарные опционы из казино. Методика ставок Парлай в первой тройке самых понятных и легких в применении стратегий. Суть идеи в следующем. Ставим столько, сколько поставили в предыдущем раунде + выигрыш предыдущего раунда. Например, вы начинали с 2 долларов, заработали на сделке + 90% (или 1,8 доллара). Значит, следующую сделку открываем на 3,8 доллара. В этой стратегии всё заточено на положительной прогрессии, ставки увеличиваем только после выигрыша трейдера.

Смысл этой стратегии в везении, человек ловит удачу за хвост и старается на этом заработать. А теперь добавьте к везению знание стратегии с высоким процентом прибыли!? Смесь получиться вообще ядерная. Основная задача для трейдера, вовремя остановиться иначе череда неудачных сделок съест весь депозит. Если вы осознаете, что фартить вечно не может и ваш план – взять определенную сумму и уйти с рынка, то возможно это вам может подойти. Если вы не знаете чувства меры, то сольете ваш депозит.

Простому игроку сложно остановиться, по этой причине всё заработанное благополучно сливается. По этой причине профессиональный трейдер-читтер не открывает огромное количество сделок. Последовательно набивает необходимую кучу денег и ложиться на дно, ставя на вывод всю сумму.

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Вот и у брокера iq option завелся такой вот вип клиент. Системно выводивший суммы по несколько миллионов долларов. Следует отдать должное брокеру, все деньги были честно выведены на счет трейдера. Впрочем проблем с выводом у этого брокера никогда не было. Ту информацию о жалобах, которую я нашла, больше походит на черный пиар от конкурентов.

Ну что сказать, молодцы. Выплатить выплатили, но больше связываться с трейдерами из России не захотели. Чтобы потом не пришлось выносить самих себя вперед ногами из России.

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لماذا الذكاء الخيار مغلق في روسيا – معلومات من الداخل

يرى المفكر المغربي سعيد ناشيد أنّ معضلة الإسلام السياسي تكمن في أنّه ساهم في تدمير مفهوم الوطن، بدعاوى تدغدغ العواطف الدينية الجياشة، معتبراً أنّ شعار “القرآن دستورنا”، كان لحظة الخطيئة الكبرى، التي أفضت إلى استكمال دائرة أدلجة الإسلام؛ حيث أصبح الإسلام مجرد أداة للتهييج الانفعالي.

ففي ظلّ تمدّد مساحة الدين، التي أضحت تستولي على مواقع وقطاعات عديدة، في الحياة، وتعالي نبرة خطابها، تلاشت وتقلّصت مساحة المشترك الإنساني والكوني، تحت ألوية الصراعات الهوياتية والتجزئة الدينية.

هل يُعقل أن تسمّى صحيفة “المدينة” دستوراً، فيما لو كان الدستور هو القرآن، أم ثمة أكثر من دستور واحد؟!

ولئن عمد ناشيد؛ صاحب “دليل التدين العاقل”، في مؤلفاته، إلى قطع أشواط جريئة ضدّ العقل الأسطوري وإسلام النص، الذي يحول دون مقدرتنا على الوصول لصياغة حقيقية للإصلاح الديني، والانتقال للحداثة العلمية والسياسية، فإنّه لا يكفّ عن التفكير في كلّ المسلمات الموروثة، واقتفاء أثر الدين في حالته الأولى والبدائية، قبل أن يتحول إلى أداة سلطوية تصادر حقّ الإنسان في تعبيره الحرّ عن إيمانه.

ويتصدّى ناشيد إلى محاولات التطبيق القسري للدين واستدعائه، في عالم له شروطه التاريخية المختلفة وقوانينه ومؤسساته، ولم تعد تحكمه قيم الولاء والبراء والطاعة والغلبة، ولا يعترف بالسبايا، وما ملكت أيمانهم والجواري والإماء. فتحوّل “الخطاب القرآني من رسالة تعبدية تنطلق من جوارح المؤمن إلى وصايا أبدية تعطل الإبداع، وتشلّ الإرادة، وحوّلوا القرآن إلى عائق من عوائق التحديث”، كما يؤكد ناشيد في حواره مع “حفريات”.

هنا نص الحوار:

تتنامى ظاهرة التشدّد الديني، الأصولي والسلفي والجهادي، بصورة تتخطى التصورات النمطية التي كانت تفسر الأمر كرد فعل على الفقر والتهميش، كيف ترى الأمر في صورته الكلية بناء على المعطيات والأمثلة الراهنة؟

دعنا نعترف، ابتداء، بأننا ننتمي إلى حضارة مهزومة، في كلّ تفاصيلها (من الشارع إلى الإدارة، والمدرسة، والأسرة، . إلخ)، وبأن شعوبنا تعاني من وطأة الشعور بالهزيمة الحضارية، وهذا الشّعور قد بدأ يتحول، مؤخراً، إلى عصاب وسواسي جماعي، يفرز ردود فعل عبثية، مجانية ولا عقلانية. يتعلّق الأمر بحالة مرضية تجعل المسلمين يتوجّسون من كلّ شيء، يعدّون أيّ شيء مؤامرة على الإسلام، أو كما جاء في الذكر الحكيم: <يَحْسَبُونَ كُلَّ صَيْحَةٍ عَلَيْهِمْ>، وللأسف، لا نستطيع أن ننكر الفرح، الذي يظهره عدد من المسلمين بالهجمات الإرهابية في الغرب، وهو دليل على أنّ الشعور بالهزيمة قد أمسى حالة مرضية مزمنة.

لا يجب أن يقتصر النقد على الإسلام السياسي بل يجب أن يطال البيئة الثقافية والأخلاقية

في واقع الأمر، ليست الهزيمة العسكرية هي المشكلة؛ فلقد انهزمت اليابان وانهزمت ألمانيا أيضاً، في الحرب العالمية الثانية، ولم تمنعهما الهزيمة من معاودة النهوض، دون صراخ أو عويل، ورغم ذلك؛ فقد كان حجم العدوان الذي واجهته اليابان، لا مثيل له، في تاريخ البشرية؛ حيث تعرّضت لإلقاء القنابل الذرية على هيروشيما وناكازاكي، لكنّ المشكلة عندنا نحن بالذات، تكمن في أنّ الشعور بالهزيمة صادف شعوراً ثقافياً بالعجز والشلل والاتكال، سواء في الأبعاد الغيبية، أو في الأبعاد الاجتماعية، وليس يخفى أنّ من طبائع العاجز، أن يحمّل مسؤولية عجزه للآخرين دائماً (السماء، السلطة، الغرب، . إلخ).

الدّاء فينا، والإنكار داء آخر، وطالما أنّ الخطاب الديني هو الأكثر تأثيراً على شعوبنا، فمن الطبيعي أن يكون الخلل كامناً في طريقة بناء الخطاب الديني، التي تكرّس العجز الإنساني والشلل الحضاري. يكفي أن نتفحّص القيم التي يكرّسها الخطاب الديني لدى أطفالنا (الله سيعذبك إن فعلت كذا، الله من يرزقك إن أطعته، يكفي أن يرضى عنك أبواك، خاصة أمك، أمّا رضاك عن نفسك فلا يهم)، لذلك أقول أيضاً: لا يجب أن يقتصر النقد على الإسلام السياسي حصراً، بل يجب أن يطال البيئة الثقافية والأخلاقية المنتجة لقيم العجز وثقافة التخلف.

الاستخدام النفعي للدين

هل الاستخدام النفعي والوظيفي للدين في السياسة، سواء من جانب الأنظمة أو الجماعات الدينية، ساهم في خلق شرعية لتحويل النص الديني إلى أيدولوجيا انبثق عنها العنف والتكفير؟

أعتقد أنّ سؤالك هذا هو صيغة جيدة لإمكانية الإجابة، لكن علينا أن نميز ابتداءً، وقبل الإجابة، بين الاستغلال السياسي للدين، والاستعمال الأيديولوجي له. الاستغلال السياسي للدين هو ما تقوم به الغالبية العظمى، من الدول والزعامات في العالم الإسلامي؛ بل قد تستعمله حتى بعض الزعامات في الغرب أحياناً. لا ننسى أنّ الرئيس الأمريكي الأسبق جورج والكر بوش قد استعمل الخطاب الديني، بغية تبرير العديد من قراراته التي يصعب تبريرها بالعقل. أمّا الاستعمال الأيديولوجي للدين فهو ينطلق من اعتبار الدين مرجعاً شمولياً لكلّ المشكلات والمسائل، ويجب أن تخضع له كافة مؤسسات الدولة، مثلما هو الحال اليوم في إيران، على سبيل المثال.

الثورة الإيرانية أوحت، في بدايتها، أنّها قد تقدم نموذجاً لدولة دينية وديمقراطية، في الآن نفسه، على الطريقة “الإسرائيلية”

تحويل النص إلى أيديولوجيا، بمعنى أدلجة الدين، هو سيرورة تاريخية طويلة الأمد، انطلقت منذ لحظة التحكيم ورفع المصاحف على السيوف، إبّان الصراع بين علي ومعاوية، وقد أكملها الإسلام السياسي، في القرن العشرين، بعبارة “القرآن دستورنا”.

المفارقة؛ أنّ الذين يرفعون اليوم شعار “القرآن دستورنا”، هم أنفسهم من يفتخرون جهاراً نهاراً، بأنّ صحيفة “المدينة” هي دستور دولة الرّسول، وهي أول دستور لدولة المسلمين. فهل يُعقل أن تسمّى صحيفة “المدينة” دستوراً، فيما لو كان الدستور هو القرآن، أم ثمة إمكانية لأكثر من دستور واحد؟!

قديماً، عندما أرسل علي بن أبي طالب ابن مسعود لمحاورة الخوارج، أوصاه بالقول: “لا تجادلهم بالقرآن فإنك تقول فيقولون”، ذلك أنّ من خصائص القرآن أنّه “حمّال أوجه”؛ لذلك فإنّ اعتماد الخطاب القرآني مرجعاً جامعاً، لم يساهم في درء الفتنة بأية حال، وقد نجح عثمان بن عفان في تجميع القرآن ضمن نصّ واحد، جامع وموحَّد، إلّا أنّ وحدة النص، لم تحل دون تفرّق المسلمين واقتتالهم، حول مفاهيم نصّ سيظلّ “حمَّال أوجه” في الأخير.

كيف ترى تلك الإشكالية التي رافقت الدولة الحديثة، في المنطقة العربية، وتأسيس أنظمة الحكم في فترة ما بعد الاستقلال، حيث عمدت إلى احتواء وتأميم المجال الديني، عبر مصادرة أدواته وحشد رأسماله الرمزي، بغية شرعنة سياساتها وتبرير إجراءاتها المختلفة وانحيازاتها المتفاوتة؟

ثمة معطى لا يجب أن ننساه، لقد صادف بناء دولة ما بعد الاستقلال، مناخ الحرب الباردة، وأثناء ذلك لجأ العالم الرأسمالي، بزعامة أمريكا، إلى سلاح الدين، في مواجهة “الإلحاد” الماركسي الستاليني.

لقد بدأ الانتباه إلى سلاح الدين، منذ فترة الرئيس الأمريكي الأسبق جيمي كارتر، التي صادفت أيضاً، اندلاع الجهاد الأفغاني وقيام الثورة الإيرانية، علماً – للتذكير أيضاً- بأنّ الثورة الإيرانية قد أوحت في بدايتها بأنّها قد تقدّم نموذجاً لدولة دينية وديمقراطية في الآن نفسه، على الطريقة “الإسرائيلية” طبعاً، ولا ننسى كذلك أنّ بناء أنظمة دينية وديمقراطية، وفق نموذج إسرائيل، هو مطلب المحافظين الجدد، حلفاء جورج والكر بوش.

والهدف، كما لا يخفى، أن يكون الشرق الأوسط متناغماً مع النموذج الإسرائيلي: دول دينية طائفية مذهبية بالفعل، لكنّها ديمقراطية أيضاً، بمعنى فيها انتخابات غير مطعون في نزاهتها.

لقد شكّلت دول ما بعد الاستقلال نوعاً من التحدي أمام الهيمنة الرأسمالية على العالم. نتذكّر إعلان باندونغ، وتجربة دول عدم الانحياز في عهد عبدالناصر، وسوكارنو، وبنبركة، وغيرهم من رموز حركات التحرر الوطني في العالم. أثناء ذلك انتبه الغرب الرأسمالي إلى إمكانية توظيف مظلومية الإخوان المسلمين، في مواجهة أنظمة كانت تبدو للغرب الرأسمالي أقرب إلى المعسكر الاشتراكي، رغم عدم انحيازها المعلن.

تم توظيف حركة المقاومة الإسلامية حماس منذ نشوئها لسحب البساط من تحت أقدام منظمة التحرير الفلسطينية

وفي السياق نفسه؛ تم توظيف حركة المقاومة الإسلامية “حماس”، منذ نشوئها ولغاية سحب البساط من تحت أقدام منظمة التحرير الفلسطينية، التي كانت تمثل التهديد الأكبر للاحتلال، وفعلاً، ما إن انهارت منظمة التحرير الفلسطينية، حتى انهار مجد القضية الفلسطينية.

والجيل الحالي من شباب المسلمين في العالم –وهذا مؤسف- لا يعرف شيئاً من مآثر وملاحم فتح، والجبهة الشعبية، والجبهة الديمقراطية، ذلك أنّ التحالف العالمي بين الغرب الرأسمالي، والإسلام السياسي، والأنظمة الرجعية العربية، قد أفضى إلى مسح ذاكرة الإنسان، وذاكرة الأرض، من الإرث الوطني لحركات التحرّر.

وبوجه عام، الكلام هنا له شجون، لكن كي أضع خلاصة واضحة أقول: تحتاج دولة المؤسسات إلى مواطنين قادرين على التحكم في الانفعالات السلبية والغرائز البدائية، تحتاج مأسسة القضاء إلى تحكّم المواطنين في غرائز الثأر والانتقام، تحتاج المنافسات الانتخابية إلى تحكّم المواطنين في غرائز الغيرة والغضب، . إلخ. غير أنّ الخطاب الديني الشائع والسائد عندنا، يساهم في تأجيج الانفعالات السلبية والغرائز البدائية؛ بل يعدّها، في الغالب، من أخلاق المؤمن: الغيرة (قد تنطلق من الغيرة على الدين ثم لا تنتهي)، والغضب (قد ينطلق من الغضب للدين ثم لا ينتهي)، والخوف (قد يبدأ بالخوف من عذاب الله ثم لا ينتهي)، الغيظ (قد ينطلق من إغاظة الكافرين ثم لا ينتهي)، . إلخ. هذا الخلل في بناء الشخصية، يمثّل عائقاً كبيراً أمام بناء دولة المؤسسات الحديثة.

الفكر الاشتراكي في العالم الإسلامي

ثمة تناقضات شهدتها فترات الحكم في مصر؛ ففي العهد الناصري، عدّ بعض المؤرخين أنّ الدولة استعانت بالدين، لكن بشكل (تثويري وتنويري) في مواجهة خصومها، وإيجاد خطاب سياسي، يستعير عناصره من الدين، حتى تتطابق وانحيازها الاشتراكي والقومي، فكان الخطاب الديني بين طرفي المعارضة والسلطة، ينزاح إلى حالات نزاع، تستخدمه الأخيرة لمواجهة خطاب التكفير، من جانب القوى المحافظة وجماعة الإخوان، فهل ترى بالفعل إمكانية الاستخدام التثويري للدين؟

لا شكّ في أنّ الفكر الاشتراكي، في العالم الإسلامي، قد حاول أحياناً إعادة تأويل الرؤية الدينية، بما يخدم مطلب العدالة الاجتماعية، مستلهماً نماذج فقراء الصحابة، من قبيل أبي ذر الغفاري، كما لا ننسى أنّ سيد قطب نفسه، وقبل انقلابه الأيديولوجي، لم يتورّع عن الكتابة في قضايا العدالة الاجتماعية في الإسلام، غير أنّ التأويلات “الاشتراكية” للإسلام سرعان ما انمحت أمام التأويل الرأسمالي، الذي عدّه الإسلام السياسي، بكلّ أطيافه، الأقرب إلى الدين والفطرة.

وفي تلك الأثناء، أملت ظروف الحرب الباردة على العالم الرأسمالي، أن ينظر إلى المعسكر الشيوعي، كعدوّ شرس قد تطول المواجهة معه لعدة قرون، كما حسب كثيرون، كما لا ننسى التدخّل السوفياتي في أفغانستان، والجهاد الأفغاني، ونجاح رموز الإسلام السياسي في شيطنة ماركس؛ بل شيطنة الفكر الغربي برمّته، بعد وصمه بالمادية والإلحاد والانحلال، غير أنّ الاستخدام التثويري للإسلام، يبقى هو الأطروحة التي بدأها علي شريعتي نفسه، قبيل الثورة الإيرانية، وقبل أن ترتد أطروحته إلى نحرها.

مآل الثورة أن تصير دولة في النهاية؛ لذلك لن يكون تثوير الدين سوى مدخل إلى دولنته أيضاً؛ بمعنى أنّنا أمام لعبة خطيرة، في آخر التحليل.

كيف ترى تورط الدولة الناصرية في تبنيها قصّة تجلي العذراء فوق أحد الكنائس بضاحية الزيتون، وتوظيفها إعلامياً باعتبارها تعزية ومساندة من السماء على الهزيمة العربية في حزيران (يونيو) 1967، وهو ما وصفه المفكّر السوري، صادق جلال العظم، بحيلة لتصفية آثار العدوان؟

هذا يؤكّد لنا، بالملموس، أنّ ردّ فعلنا إزاء الهزيمة، جراء نرجسيتنا المجروحة، جاء على نحو نكوصي مرضي، سرعان ما سيجعل من الدين نوعاً من العصاب الوسواسي، بدل أن يكون رحمة للعالمين. فنحن لم نحوّل الهزيمة إلى سؤال عقلاني، كما فعلت اليابان مثلاً؛ بل جعلناها مبرّراً للبحث عن انتصارات أسطورية غيبية، تمنحنا مسكّنات تكرّس العجز في آخر المطاف.

أخبرني أصدقاء في غزة عن ظاهرة جديدة بدأت تنتشر عندهم مؤخراً، يتعلق الأمر بظاهرة طرق الأبواب فجراً، للذهاب على شكل أفواج وجماعات إلى صلاة الفجر، وكلّ من يفعل ذلك يظنّ أنّ له أجراً عظيماً، بل الرهان أعظم من ذلك؛ إذ ثمة خطاب تبشيري، مفاده أنّ الحرص على صلاة الفجر، سيكون مدخل الأمة إلى الانتصار (الانتصار على من؟!).

وفي كلّ الأحوال، يبقى السؤال معلقاً: ما علاقة صلاة الفجر بالانتصار كيفما كان نوعه؟ بكل تأكيد، ليس المقصود بالانتصار هنا القضاء على الفقر والجهل والرشوة والغش والخرافة. كلّ ما في الأمر أنّنا نعيش بوادر انتكاسة مروّعة إلى الرؤية السحرية للعالم؛ حيث بعض الطقوس الجماعية، يمكنها أن تكون كافية لإقناع السماء بمساعدتنا، على التمكين والنصر المبين.

يُردّ الجهل بالمعرفة

إلى أي حدّ يمكن عدّ الاستخدام الانتهازي والمحدود للدين سبباً في توسيع حاضنة أصولية ومتطرفة في المجتمع؟

التوظيف الأيديولوجي للدين، في إطار الصراع على السلطة، لم يخدم في آخر المطاف سوى القوى الأصولية النكوصية. وهذا طبيعي؛ فقد حاول أنور السادت في مصر أن يضرب عصفورين بحجر واحد، احتواء الإسلام السياسي وتصفية تركة جمال عبد الناصر؛ لذلك لجأ إلى سلاح الدين، وقد اصطلح على نفسه صفة “الرئيس المؤمن”، لكن ماذا حدث في الأخير؟ اغتالته أيادي الإسلام السياسي نفسها.

لذلك نقول: ليس صحيحاً أنّ الدواء من جنس الدّاء، فلا يُردّ الجهل بالجهل، بل يُردّ الجهل بالمعرفة.

لماذا لم يتحرّر العقل العربي من التفكير البدائي، ويتجاوز المرحلة اللاهوتية، لو استعرنا تعريف أوغست كونت للمراحل التاريخية التي تمرّ بها البشرية، وتنتهي عند المرحلة الوضعية العلمية، وأدوات التحليل النقدي؟

شخصياً، لا أراهن على أن تتخطى البشرية المرحلة اللاهوتية، وفق الرؤية الوضعية، لأوجست كونت؛ بل أراهن على تحوّلات جذرية في حقل الروحانيات والتدين، وفي المستوى العالمي كذلك.

وبكلّ بساطة، لا يمكن تخطّي المرحلة الدينية ما لم تنجح البشرية في القضاء على الموت، على أقل تقدير، فبوجود الموت ستظل البشرية في حاجة إلى نوع من العزاء. صحيح أنّ ثمة ما يسمّى “موت الفلاسفة”، وهو الأسلوب الذي تحدّث عنه جاك ديريدا، في آخر حواراته، لا بل سبق أن تحدّث عنه سينيكا وشيشرون ومونتين، الذي يتعلّق بكيفية تقبّل الفناء كقدر أخير، بكامل الرضا، وبدون عزاء بالضرورة، لكن الناس ليسوا جميعاً فلاسفة، وليسوا جميعاً حكماء.

الخطاب الديني الشائع يساهم في تأجيج الانفعالات السلبية والغرائز البدائية، بل يعدّها في الغالب من أخلاق المؤمن

وفي كل الأحوال، فأنا أميّز بين الخروج عن الدين، الذي هو شأن شخصي، والخروج من الدين، الذي هو صيرورة تاريخية طويلة الأمد.

غير أنّني أظنّ، في المقابل، أنّنا نعيش انتكاسة ليس فقط نحو الاستعمال الأيديولوجي للدين، إنّما نحو الاستعمال السحري للدين. يكفي أن ننظر من حولنا إلى تكاثر مراكز الرقية الشرعية، واستعمال القرآن في العلاج الطبي، وبرامج الإعجاز العلمي التي هي مجرّد عجز علمي، وليست إعجازاً، حتى نتأكد من حجم الانتكاسة إلى أنماط التدين البدائي.

ما هي الشروط المؤدية إلى ذلك الانسداد التاريخي في المجتمعات العربية والإسلامية والمتسببة في انتصار متزايد لأصحاب نظرية الحق الإلهي، واغتيال العقل في الإسلام، منذ هزيمة المعتزلة وتأبيد واقع ونمط ديني محدَّد ومغلق؟

كان الانقلاب المتوكّلي لحظة حاسمة ضمن مسلسل هزيمة العقل، وتغييبه بدعوى شعار يقول: “لا اجتهاد مع النصّ”، وهو الشعار الذي سرعان ما أصبح يعني “لا اجتهاد في النص” أيضاً.

والمفارقة؛ أنّ النص الديني نفسه هو ثمرة اجتهاد المسلمين عقب وفاة الرسول، من حيث الجمع والترتيب والتبويب والتدوين، سواء تعلّق الأمر بالمصحف أو الصحاح، بيد أنّ المعضلة الكبرى تكمن في أنّ مركز ثقل النصّ، قد انتقل من الخطاب القرآني، إلى الخطاب الحديثي.

ولقد صار كلام الرسول، في آخر المطاف، أهم من كلام الله، لا سيما بعد أن انتهى الأمر إلى الإقرار بأنّ “السنة قاضية على القرآن”، كما ردّد الإمام ابن حنبل، وبهذا المعنى، وبصريح العبارة؛ فإنّ الذي سيعطّل العقل ليس النصّ القرآني، إنّما هو النص الحديثي، مضاف إليه النص الصحابي، والنص التابعي، وصولاً إلى شيوخ الفضائيات اليوم.

بخصوص شعار “القرآن دستورنا”

لقد تحوّل النص الديني، في لغته الحسية والتصويرية والمجازية، إلى قوانين ونصوص دستورية ونظريات علمية، يجري توظيفها البراغماتي لبناء المشروعية السياسية.. لماذا تخفق مشروعات التحديث في تصفية ذلك الاتحاد بين السلطتين؛ الدينية والسياسية؟

أعتقد أنّ شعار “القرآن دستورنا”، كان لحظة الخطيئة الكبرى، التي أفضت إلى استكمال دائرة أدلجة الإسلام؛ حيث أصبح الإسلام، لدى بعض الناس، مجرد أداة للتهييج الانفعالي، والمزايدة الغوغائية، طلباً للسلطة أو الغنيمة. لا بأس أن نذكر، مرة أخرى، أنّ القرآن ليس دستوراً؛ لأنّه لم يصف نفسه بأنه دستور، ولأنّ آياته حمّالة أوجه، وفيها محكمات ومتشابهات، وناسخات ومنسوخات..إلخ.

وليس هكذا يكون الدستور، الأدهى من ذلك؛ أنّ الدسترة سوف لن تقتصر على النصّ القرآني حصراً، إنّما ستشمل مدوّنة الحديث بعد تضخّمها، فضلاً عن المتن الصحابي والتابعي، فقد تحوّل النص الديني إلى سلطة ضدّ العقل، والإبداع، وحرية الإنسان، ويكفي أن نسمع في خطب الجمعة نصاً دينياً منسوباً إلى الرسول، يتردد أمام مسامع المؤمنين، ويقول: “كلّ بدعة ضلالة، وكل ضلالة في النار”، حتى ندرك أنّنا، باسم النص، نقتل روح الإبداع. وهل تكون الحداثة شيئاً آخر غير القدرة على الإبداع؟!

كيف تصف ذلك المشهد الذي أضحى فيه المصحف بين منزلتين؛ إما وسيلة للحكم والقتل أو أيقونة مقدسة للزينة والتبرك؟

حال القرآن، الآن، محصور بين مآلين: الاستعمال الأيديولوجي في إطار الصراع على السلطة، وهو ما قلت في سؤالك إنّه “وسيلة للحكم”. والاستعمال السحري في إطار الرؤية السحرية للعالم، وهو ما قلت في سؤالك إنّه “أيقونة للتبرّك”، أمّا مسألة الزينة، فهي، في وجهة نظري، تبقى إيجابية لو تحرّرت من الاستعمال الإيديولوجي، والاستعمال السحري.

يتعلّق الأمر، في كل الأحوال، بخضوع النص القرآني للأدلجة والأسطرة، أولاً: أدلجة النص القرآني من حيث عدّه مرجعاً شمولياً لكلّ شيء، الدولة والسياسة والاقتصاد والجنس، . إلخ. وثانياً: أسطرة النص القرآني، من حيث عدّه مفتاحاً سحرياً لكلّ المسائل والمشكلات، من أسواق المال إلى طبّ العيون، ومن الملاحة الجوية إلى أسعار الجبن، وكل هذا مجرّد عبث بالدين.

الأخطار المتوقعة

تواجه مجتمعاتنا، بعد الربيع العربي، ولادة تيارات دينية تقود ما يمكن تسميته بدويلات طائفية، وتستولي على مساحات جغرافية تهدد وحدة الدولة الوطنية، وفي المقابل؛ أصبح لكلّ فئة وكتلة اجتماعية وسياسية، مذهباً له مجالسه العلمية ودور الإفتاء التي تضمن له الشرعية وتكفير خصومه ومنافسيه. كيف ترى مآلات ذلك المشهد ومسبّباته الواقعية؟

يمكننا القول: إنّ الخطر الذي ينتظرنا، يتّصف بالتركيب والتعقيد، فثمّة توجّه عامّ نحو التفكّك والتفتت، في إطار طغيان نوعين من الولاءات: أولاً؛ الولاءات الدينية المحلية (الإمارات الصغرى)، من قبيل تلك المحاولات التي راهنت على تشكيل إمارات، في تومبوكتو أو سيناء أو غرداية، . إلخ. وثانياً: الولاءات الدينية العابرة للأوطان، والموسومة بالاحتلال والحنين إلى عصر التوسعات الإمبراطورية.

وهنا نلاحظ كيف يحاول السلطان “أردوغان” العثماني، استثمار ولاء فصائل الإسلام السياسي لأجل إعلان عودة الخلافة، وهو يقصد الخلافة العثمانية تحديداً، التي هي، باختصار، الفترة الأكثر غزواً، والأقل إبداعاً، في تاريخ الحضارة الإسلامية. لكن مقابل ذلك؛ ثمّة مشروع مذهبي منافس، يقوم على أساس ولاية الفقيه الإيرانية، وتدعمه إيران هذه المرّة.

وبالنسبة إلى الشرق الأوسط، يتعلق الأمر بولاءات طائفية واستعمارية، سواء كانت عابرة للأوطان، أو دون الأوطان، لكنّها ستشعل مزيداً من الفتن وتدمّر البقية الباقية، من مفهوم الوطن.

ما يجري في سوريا يعكس حجم الفراغ الوطني الذي تحاول أن تملأه ولاءات طائفية واستعمارية، باسم الإسلام

وما يجري اليوم في سوريا؛ من قتال الإخوان المسلمين والنصرة تحت لواء القوات التركية، وقتال حزب الله تحت لواء الحرس الثوري الإيراني، يعكس حجم الفراغ الوطني الذي تحاول أن تملأه ولاءات طائفية واستعمارية، ولو باسم الإسلام هذه المرّة، الذي هو أعزّ شيء إلى قلب الشعوب.

ولا ننسى أنّ المغول دخلوا إلى الإسلام فقط من أجل شرعنة احتلالهم للعالم الإسلامي، غير أنّ الاحتلال، في كل الأحوال، يبقى احتلالاً، وحتى التاريخ الرسمي لا يقول غير ذلك، معضلة الإسلام السياسي تكمن في أنّه ساهم في تدمير مفهوم الوطن، بدعاوى تدغدغ العواطف الدينية الجياشة (أمة محمد، أمة لا إله إلا الله، . إلخ).

والواقع، أنّ الوطن هو خطّ الرجعة الأخير، قبل اشتعال الفتنة التي ستحرق اليابس والأخضر. وهذا تحذيرنا الأخير.

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وليد عبدالحي: رفعت تركيا الشعار الديني وتحالفت مع الإخوان لتمرير مشروعها

قال الباحث الدكتور وليد عبدالحي إنّ الشرق الأوسط من أكثر المناطق اضطراباً وتوتراً، كونها منطقة “رخوة” تتصادم فيها المشاريع الدولية والإقليمية المتعارضة، ودلّل على ذلك الاضطراب بتركيا التي رفعت الشعار الديني وتحالفت مع جماعة الإخوان المسلمين لتمرير مشروعها.

وكشف أستاذ العلاقات الدولية في جامعة اليرموك وجامعة آل البيت، في حوار مع “حفريات”، عن أبرز الإستراتيجيات والمشاريع المتعارضة في المنطقة، بدايةً من المشروع التركي وتنبُّه المؤسسة العسكرية العربية له ومحاولة التصدي له، مروراً بمستقبل “محور المقاومة”، وفُرَص تعزّزه خلال المرحلة القادمة، وصولاً إلى الاهتمام والتوجه الروسي المتزايد بالشرق الأوسط الذي انتهى إلى التدخل في سوريا، وتزامن كل ذلك مع الانسحاب وتراجع الاهتمام الأمريكي بالمنطقة مقابل النفوذ الصيني المتزايد.

صفقة القرن مجرد كلام، لم تُقدم للأمم المتحدة ولا للكونغرس، الإشكال أننا الآن نتعامل مع ما يشبه الإشاعة الرسمية

ونوّه عبدالحي إلى أنّ المشروع التركي في المنطقة العربية جرى كما خطط له أوغلو؛ حيث أدرك صانع القرار التركي أنّه إذا ما رفع الشعار القومي، فإنّه ستتم مجابهته، مثلما حدث أثناء الثورة العربية الكبرى، فتنبّهت لرفع الشعار الديني، وبذلك كان العامل الديني هو الجسر الأهم في المشروع التركي، وهنا برزت حركة الإخوان المسلمين بمختلف تنظيماتها وفروعها، باعتبارها القوة الأساسية للعامل الديني في المنطقة العربية؛ والحركة السياسية الأكثر تنظيماً في المنطقة، ووطدت تركيا علاقاتها بالجماعة.

ويرى عبدالحي أنّ التزام إيران بمحور “الممانعة” مرتبط بمرحلة ما بعد خامنئي، الذي من المتوقع، بحسبه، أن تُحدث وفاة خامنئي خلافات في إيران على وريثه، وخلافاً حول منصب “المرشد الأعلى”، طالما هناك رئيس إيراني منتخب، وقد يكون الخلاف حول تحويله إلى مجلس منتخب، أو حول حصر صلاحياته في الشأن الديني، وهو ما قد يفتح مجالاً لاضطراب داخلي.

ويذكر أنّ الدكتور وليد عبد الحي، كان عمل في معهد العلوم السياسية والعلاقات الدولية في جامعة الجزائر خلال الفترة 1982-1994؛ أستاذاً للدراسات المستقبلية، وشغل منصب رئيس قسم العلوم السياسية في جامعة اليرموك خلال الفترة 1996-1998. له العديد من المؤلفات والدراسات في مجال الإستراتيجية والدراسات المستقبلية، ومن أهمها: “معوقات العمل العربي المشترك” (1987)، و”تحول المسلمات في العلاقات الدولية” (1994)، و”مستقبل الفكر الصهيوني” (1997).

فيما يلي نص الحوار:

باعتبارك متخصصاً في الدراسات الاستشرافية، هل بالإمكان أن يكون حوارنا هذا استشرافياً لمستقبل المنطقة، بالمعنى الدقيق للكلمة؟

بالنسبة لي لا أميل إلى بناء السيناريوهات اعتماداً على “الذاكرة”؛ لأنه حتى يتم تحديد طبيعة العلاقة بين دولتين، فإنه لا بد من العودة إلى فترة زمنية سابقة، لنقل إذا كنّا نعدّ سيناريو استشرافياً لمدة السنوات العشر القادمة، هذا يعني على الأقل أنه يجب العودة الى عشر سنوات سابقة حتى نحدد الـ Trend (الاتجاه العام)؛ هل العلاقة متذبذبة؟ أم متصاعدة؟ أم هي في حالة تراجع؟ أما الاعتماد على الذاكرة فإنه لا يفيد؛ بل يجب جمع ومعرفة بيانات عديدة من أجل بناء النموذج الاستشرافي، إلى جانب المؤشرات الإقليمية والدولية، ومن ثم نقوم بحساب التأثير المتبادل، حتى نستطيع إعطاء صورة، لكن أغلب ما يتم كتابته وتحليله، خاصة في الفضائيات العربية، هو أقرب إلى الاستشراف الحدسي؛ حيث يقوم المحلل برسم الصورة بناء على عدد محدود وقليل من المؤشرات، ولذلك فإنه في كثير من الأحيان تكون النتيجة الواقعية مخالفة للتوقعات.

التوقعات الحدسية لمستقبل المنطقة

هل بالإمكان إعطاء مثال على التوقعات الحدسية التي كانت مخالفة للواقع؟

بالتأكيد، بالإمكان إعطاء مثال على ذلك، مثلاً، لقد ذهبت نسبة كبيرة جداً من الكتابات حول “الربيع العربي” الى إعطاء دور كبير لوسائل التواصل الاجتماعي، وهو التفسير الذي راج على نحو واسع جداً، ولكنني، وبحكم طريقة تقكيري، فإنه ليس عندي استعداد لتلقي أي معلومة لمجرد انطباع سائد، ومن ثم البناء عليها، لذلك قمت بإحضار نسب استخدام الإنترنت ووسائل التواصل الاجتماعي، ونسب المشتركين في شركات الاتصالات، في كل الدول العربية، ومن ثم أحضرت مؤشرات ومقاييس درجة الاستقرار السياسي في كل دولة، لأجد بأن النتيجة مخالفة تماماً؛ حيث كانت الدول الأكثر استقراراً هي التي ترتفع فيها نسب استخدام التواصل الاجتماعي، لذلك فإن كل ما بُني على الانطباع فإنه سيؤدي إلى استنتاجات خاطئة.

إذا ابتعدنا قليلاً عن رسم النماذج الاستشرافية الدقيقة، وتكلمنا بمنطق الإستراتيجيات، وخصوصاً في سياق منطقتنا، برأيك ما هو مستقبل إستراتيجة أوغلو “العمق الإستراتيجي”؟ وهل هي قابلة للتطبيق في المرحلة القادمة؟

لقد كان أوغلو بمثابة المنظر لسياسات حزب العدالة والتنمية الخارجية، خلال السنوات الماضية، ومنذ وصول الحزب الى الحكم، وجوهر ما ذهب اليه هو إدراك أنّ أوروبا لا تريد عضوية تركيا؛ بل على العكس من ذلك، فإنّ الفجوة معها تزيد ولا تضيق، وإنما هي تقبلها فقط بحدود معينة، كالشراكة في قوات حلف شمال الأطلسي، ولكن ليس أكثر من ذلك، ليس كشريك في الاقتصاد وصناعة القرار السياسي على مستوى القارة. ولأن الجغرافيا هي التي تفرض المجال الحيوي، فقد أدرك أوغلو أن منطقتي آسيا الوسطى والشرق الأوسط، هما المجال الحيوي المتبقي أمام الأتراك، فأما آسيا الوسطى فهي منطقة تنازع بين النفوذ الروسي والصيني مما لا يسمح بالدخول فيها من قبل آخرين، أما المنطقة التي تقبل المراوغة والقابلة لـ “النهش”، المنطقة “الرخوة” إلى الحد الذي يسمح بالامتداد فيها، فهي منطقة الشرق الأوسط، وعموم المنطقة العربية، ولذلك رأى أوغولو أنه لا بد من مد الجسور إليها.

المشروع التركي في المنطقة

ولكن ما هي هذه الجسور؟

لقد أدرك صانع القرار التركي أنّه إذا ما رفع الشعار القومي، فإنّه ستتم مجابهته، وسنعود إلى أجواء الثورة العربية الكبرى، أما إذا تم رفع الشعار الديني، فإنّ فرصة تقبل المشروع التركي في المنطقة ستكون أفضل، وبذلك كان العامل الديني هو الجسر الأهم، أما الأدوات والجسور الأخرى كالعلاقات الاقتصادية والعسكرية، فإنّ تركيا كانت مدركة بأنها لن تستطيع منافسة الولايات المتحدة، أو روسيا، أو الصين، أو الاتحاد الأوروبي، فيها. وهنا برزت حركة الإخوان المسلمين بمختلف تنظيماتها وفروعها، باعتبارها القوة الأساسية للعامل الديني في المنطقة العربية؛ حيث إنّها الحركة السياسية الأكثر تنظيماً في المنطقة، بدليل قدرتها على الفوز عند إجراء الانتخابات، كما حدث في الجزائر عام 1991، والأردن عام 1989، ومصر عام 2020، ومن هنا بدأ التقارب بين تركيا والإخوان المسلمين، منذ فترة ما قبل سنوات “الربيع العربي”، وهو ما رأيناه في الجانب الدعائي لحادثة أسطول الحرية، وما تم من ترويج لتركيا باعتبارها معادية لـ”اسرائيل”، وهو ما لفت الانتباه العربي إلى تركيا وأردوغان، ليبدأ بعد ذلك تعزيز التواصل ما بين الإخوان وأنقرة. وقد عنى نجاح هذا المشروع تضاعف القدرة التركية على منافسة النفوذ والمشروع الإيراني التوسعي في المنطقة، وكذلك على منافسة النفوذ الإسرائيلي، وخصوصاً بعد أن بلغ المشروع مرحلة متقدمة إثر نجاح الإخوان في الوصول إلى الحكم عام 2020، حيث كان من المؤكد أنه سيكون هناك تقارب ونمو في التعاون على جميع المستويات بين الدولتين المركزيتين في المنطقة؛ تركيا ومصر.

ومتى حدثت نقطة التحول؟

في البداية جرى المشروع التركي كما خطط له أوغلو، ولكن ما حصل بعد ذلك هو أنّ المؤسسة العسكرية العربية استشعرت الخطر، فجاء عزل مرسي، وهو ما أدى إلى كسر العمود الفقري للمشروع التركي كله، وهو ما يفسر العداء اللاحق بين تركيا ومصر، وسببه أن مصر أفشلت المشروع التركي في المنطقة، وكان المساند الأول لها السعودية؛ إذ إنها ترفض أي شكل من أشكال التنظيم السياسي، وبالأخص الإسلامية منها، وخصوصاً أنّ حركة الإخوان يوجد لها مؤهلات في السعودية، من حيث كون المجتمع السعودي محافظاً، إضافة إلى العلاقات السابقة بين السعودية وحركة الإخوان في الفترة الناصرية وما بعدها. وكانت النهاية التامة للمشروع التركي بعد الصدام مع الروس في سوريا، والذي بلغ ذروته مع إسقاط المقاتلة الروسية في تشرين الثاني (نوفمبر) 2020. وكانت نتيجة كل ذلك هي إبعاد داوود أوغلو من السلطة، وهو ما عنى النهاية التامة للمشروع واتهام أوغلو بتوريط تركيا فيه.

تركيا وإيران: تصالح المصالح

وماذا كان الخيار البديل؟ هل اتجه الأتراك نحو الإنكفاء؟

لقد شعر الأتراك بأنّ إيران أدارت اللعبة بطريقة أذكى، لذلك اقتنعوا بأنه لا بد من التصالح مع القوى التي كانت تريد منافستها. فبدأ التقارب مع إيران، والتصالح مع روسيا، وبالنسبة لـ”إسرائيل” فإنّ العلاقات التجارية معها في تصاعد مستمر. أما الآن فإنّ خلاف الأتراك الأبرز هو مع الولايات المتحدة وبالأخص حول ملف أكراد سوريا، وهو ما نراه في هذه الأيام مع التدخل التركي في عفرين، والذي يبدو أنّ النظام السوري يشعر بالارتياح تجاهه؛ إذ إنه يضرّ الأتراك، ويريحه من مواجهة الأكراد. ويمكن أن نضيف إلى المشاكل التي تواجه تركيا: الخلاف مع الاتحاد الأوروبي، وبالأخص حول قضية اللاجئين. وأعتقد أنّ ما يقوم به أردوغان الآن هو محاولة علاج آثار فشل المشروع الأول بقدر من التعاون مع القوى الإقليمية الموجودة.

وبذكر روسيا، وتدخلها الحاسم في الملف السوري، هل بالإمكان الحديث عن اهتمام روسي متزايد بالمنطقة؟

بالتأكيد، بالعودة إلى الماضي، لو أخذنا روسيا القيصرية، وروسيا الاتحاد السوفيتي، وروسيا الحالية، فإن الدول الثلاث كانت تعتبر غرب آسيا بمثابة الإطار الأكثر جاذبية، وباعتقادي، في الفترة الحالية، وحتى ندرك موقف روسيا، فإنه لا بد من قراءة “الكساندر دوغين”، وهو المنظّر الإستراتيجي لبوتين، وملخص ما يذهب إليه دوغين هو أن مجال روسيا الحيوي يتمثل في مناطق: شرق آسيا، وغرب آسيا، وشرق أوروبا، فأما شرق آسيا؛ ففيها الصين واليابان، وهي دول ليس من السهل منافستها، وأما شرق أوروبا فإنه مغلق الآن تماماً أمام الروس بسبب انضمام دول شرق أوروبا إلى الاتحاد الأوروبي وحلف شمال الأطلسي. وبذلك بقيت منطقة غرب آسيا هي المنطقة “الرخوة”.

آسيا بالنسبة للروس

إذاً، ما هي أهم النقاط التي يمكن أن نلخص بها أهمية منطقة “غرب آسيا” بالنسبة للروس؟

تأتي أهمية “غرب آسيا” بالنسبة للروس من عدة نقاط؛ أولها: أنّ تنامي الحركات الإسلامية في غرب آسيا قد يحرك الحركات الإسلامية الانفصالية في جمهوريات القوقاز الروسية، بالإضافة إلى جمهورية تتارستان. أما النقطة الثانية: فهي أن ضمان سوق مستقر لأسعار النفط لا يمكن أن يتم إلا بالتنسيق مع دول الخليج النفطية. والنقطة الثالثة: أنه لا يمكن الوصول للمياه الدافئة (البحر المتوسط) إلا عبر المنطقة العربية، ويضاف إلى كل ذلك أن هناك استشعاراً في روسيا بأن الولايات المتحدة لم تعد هي القوة الأكثر تأثيراً في المنطقة؛ فأمريكا الآن ترى أنّ منطقة المحيط الهادي وشرق المتوسط أكثر أهمية؛ ذلك أن اعتمادها على النفط العربي آخذ بالتراجع، إضافة إلى أن الصين آخذة بالاستحواذ على السوق الاقتصادي العربي، فلو نظرنا إلى إحصاء العام 1981 سنجد أنّ حجم تجارة الصين مع المنطقة العربية كان 0.1 حجم تجارة الولايات المتحدة مع المنطقة، أما الآن فحجم التجارة الصينية مع المنطقة العربية يفوق الولايات المتحدة بـ 36 مليار، وبالنظر إلى مبيعات الأسلحة فإن أكبر مشتري السلاح في المنطقة، وهم: الجزائر، وسوريا، ومصر، نجد أن معظم مشترياتهم من روسيا، وهكذا فإن الولايات المتحدة بدأت تتحلل من ارتباطاتها في المنطقة، وهو بالطبع لا يحصل ببساطة وبشكل سريع.

الكلام الآنف يشير إلى وجود رؤية إستراتيجية خلف القرار الروسي بالتدخل في سوريا؟

كما تقدم، فإنّ روسيا تدرك بأنّ هذه المنطقة هي الأساس بالنسبة لها، حتى أن دوغين يشبّه الصورة بأنّ لروسيا فتحتي أنف؛ شرق أوروبا، وغرب آسيا، أما شرق أوروبا فقد تم تسكيرها، وبذلك لم يتبق إلا غرب آسيا، إذا تم إقفالها فإن روسيا ستختنق. وهو ما حاولت الولايات المتحدة الاشتغال عليه فعلاً، من خلال مساعي ضم جورجيا، وأرمينيا، وأذربيجان، إلى حلف شمال الأطلسي؛ حيث كان من المفترض أن تنضم أرمينيا في عام 2020 للأطلسي، ولو انضمت كانت ستتبعها أذربيجان، بالإضافة إلى ذلك كان الأمريكيون قد اسسوا قاعدة عسكرية في قرغيزيا، كما عقدت كازخستان اتفاقية “التجارة من أجل السلام” مع حلف الناتو، وبذلك كان الخناق يضيق على روسيا أكثر فأكثر. لذلك دخل الروس على جورجيا وقسّموها، وعندما رأت أرمينيا وأذربيجان الضرب في جورجيا أنهوا فكرة الانضمام إلى حلف شمال الأطلسي، أما القاعدة القرغيزية فتم إغلاقها بعد فرض شروط صعبة من قبل البرلمان، وكذلك اتجهت كازاخستان إلى إنهاء اتفاقية الشراكة مع الاتحاد الأوروبي. بعد ذلك، وعندما رأى الروس كيف فشل الغرب في تطويقهم على مستوى الحزام الأول الأقرب لهم، انتقلوا إلى الحزام الثاني، والمتمثل في: إيران والعراق، وسوريا، ولبنان؛ لحمايته؛ لأنه في حال استقرار الولايات المتحدة فيه فإنها ستعود للحزام الأول، ومن هنا جاء التعاون الروسي-الإيراني-السوري.

صفقة القرن

بالحديث عن الانسحاب الأمريكي من المنطقة، هل يمكن أن نضع “صفقة القرن” في إطار هذا الانسحاب؟

صفقة القرن حتى الآن هي مجرد كلام، لم تُقدم للأمم المتحدة ولا للكونغرس، الإشكال أننا الآن نتعامل مع ما يشبه “الإشاعة الرسمية”، المصدر الوحيد الذي قدم معلومات عن الصفقة هو التقرير الذي نقلته بعض وسائل الإعلام، والذي كتبه صائب عريقات وقال فيه بأن ترامب عرض فيه الصفقة على السعودية، والسعودية نقلت بدورها الموضوع إلى الجانب الفلسطيني؛ حيث تتضمن الانتهاء من ملف القدس وإعلان أبو ديس عاصمةً لفلسطين، وضم “إسرائيل” 40% من مساحة الضفة: 25% من القدس والمناطق المحيطة بها، و15% من المناطق “أ”، والـ 60% المتبقية تصبح جزءاً من أقاليم مرتبطة بالأردن، بحيث تكون العلاقة فدرالية فيما بينها، وعاصمتها عمّان، وطبعاً مع إلغاء حق العودة للاجئين، وتقديم بعض المساعدات للاقتصاد الأردني والفلسطيني، وحتى هذا الإعلان، لو أخذنا كل بند منه على حدة، سنجد أنه كان مطروحاً من السابق؛ مبادرة ريغان (1982) مثلاً تجاوزت حق العودة، وموضوع نقل السفارة الأمريكية إلى القدس كان مطروحاً منذ الـ 1995.

بالعودة للحديث عن المنطقة، والسيناريوهات المستقبلية المتوقعة، هل برأيك أننا نتجه نحو مرحلة تعزيز وانتصار لـ”محور الممانعة”؟

أعتقد في الفترة القريبة القادمة قد يبقى الجميع على مواقفه المعلنة، ولكن المعظم سينكفئ للداخل، سوريا الآن في مرحلة ترميم بنيتها، سواء من ناحية وضعها الاقتصادي، أو وضعها العسكري، أو الانشقاق داخل المجتمع، العراق أيضاً، ما يزال يواجه تحديات من أجل تحقيق الاستقرار السياسي الداخلي، أما إيران، فباعتقادي أن التزامها بـ “محور الممانعة” مرتبط بمرحلة ما بعد خامنئي، وهو رجل الآن على أبواب الثمانينيات ويقال بأنه مصاب بالسرطان، وباعتقادي، أنّ هناك مشكلة في إيران تتمثل بأن الجرعة الدينية في النظام السياسي أعلى بكثير مما هي عليه في المجتمع. وعند وفاة الخامنئي قد يحدث خلاف على وريثه، وقد يحدث خلاف حول منصب “المرشد الأعلى”، طالما هناك رئيس إيراني منتخب، وقد يكون الخلاف حول تحويله إلى مجلس منتخب، أو حول حصر صلاحياته في الشأن الديني، وهو ما قد يفتح مجالاً لاضطراب داخلي، ولكن الحقيقة لا بد من التنبيه أن الإيرانيين قد أثبتوا قدرتهم على استشراف الأزمات، ومحاولة وضع أسس لحلها قبل أن تنفجر.

وهل نتوقع أن تبقى سوريا خلال المرحلة القادمة مرتبطة بالجمهورية الإيرانية؟

باعتقادي أنّ السوري يتمتع بعقلية فينيقية، عقلية التاجر، التي تمكنه من البحث عن تدبير شؤونه بشكل مستقل، لذا أتوقع أن تتمكن سوريا من تحقيق قدر من الاستقلالية وعدم التبعية، وقد يكون هناك صيغة تشاركية ما بين سوريا وإيران، وخصوصاً أن إيران ليست دولة صناعية، ربما سيكون هناك اعتماد على إيران في بعض القطاعات مثل صناعة السيارات، ولكن في قطاعات أخرى كالنسيج واللباس أعتقد أن سوريا ستحقق استقلالاً فيها، وإن كان الحديث عن ذلك مبكراً الآن، خصوصاً أنّ سوريا ستمر بداية في مرحلة “إعادة ترميم” قبل الحديث عن إعادة بناء القطاعات الصناعية. وبالإجمال، أتوقع أن يكون الحال في سوريا مختلف عما هو في العراق؛ حيث يلعب الرابط المذهبي في العراق دوراً أكبر، ويؤدي إلى تبعية اكبر للجمهورية الإسلامية.

وماذا عن الصين وتزايد اهتمامها بمنطقتنا، هل سنشهد زيادة في النفوذ الصيني خلال المرحلة القادمة؟

نعم، أعتقد ذلك فعلاً، الآن الصين ماضية في تنفيذ مشروعها الإستراتيجي “طرق واحد.. حزام واحد”، وهو مشروع لا بد أن يمر في المنطقة العربية. وما يستتبع ذلك من تزايد الاستثمارات الصينية في المنطقة، وتزايد حجم التبادل التجاري مع الدول العربية، ومن المؤكد أنّ الصين ستحمي مصالحها في المنطقة، وبدأت فعلياً؛ حيث تم بناء أول قاعدة عسكرية مؤخراً في جيبوتي.

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